प्यार के पीछे काम करते हैं हार्मोन और केमिकल । वेलेंटाइन सप्ताह विशेष


शहरी चौपाल ब्यूरो
वेलेंटाइन सप्ताह विशेष
सहारनपुर। प्यार, इश्क और मोहब्बत केवल भावनाओं का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे शरीर में होने वाली रासायनिक और हार्मोनल प्रक्रियाएं अहम भूमिका निभाती हैं। मेडिकल साइंस के अनुसार शरीर में कुछ विशेष हार्मोन और केमिकल का स्राव व्यक्ति को प्यार की राह पर ले जाता है। इनके अधिक सक्रिय होने पर व्यक्ति खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाता और भावनाओं में बहने लगता है।
हृदय रोग विशेषज्ञ एवं फिजिशियन डॉ. संजीव मिगलानी (एम.डी. गोल्ड, मेडिसिन) के अनुसार प्यार के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती और न ही यह केवल विपरीत लिंग तक सीमित रहता है। समान लिंग के प्रति आकर्षण भी इन्हीं शारीरिक प्रतिक्रियाओं का परिणाम होता है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही मानते हैं कि किसी व्यक्ति के प्रति बढ़ता रुझान हमारे शरीर के अंदर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं से जुड़ा होता है।
डॉ. मिगलानी बताते हैं कि प्यार की शुरुआत सबसे पहले मोह से होती है। इस चरण में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और लालसा पैदा होती है। पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन और महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। इस अवस्था में हल्का डर और संकोच भी महसूस होता है।
इसके बाद आता है एक्साइटमेंट का दौर, जहां भावनाएं और अधिक गहरी होने लगती हैं। इस पड़ाव पर व्यक्ति मोह से आगे बढ़ जाता है। इस आकर्षण में तीन प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर सक्रिय होते हैं—एड्रेनालिन, डोपामिन और सेरोटोनिन।
एड्रेनालिन के प्रभाव से शरीर में तनाव का स्तर बढ़ जाता है। इसके साथ ही कोर्टिसोल हार्मोन का स्राव भी अधिक होता है, जिससे बेचैनी, घबराहट और अजीब-सी उत्तेजना महसूस होती है। यही बेचैनी धीरे-धीरे प्यार में बदल जाती है।
डोपामिन को इच्छाओं का हार्मोन कहा जाता है। इसका प्रभाव दिमाग पर किसी नशीले पदार्थ जैसा होता है। इसके कारण नींद कम आना, भूख न लगना, काम में मन न लगना और हर समय उसी व्यक्ति के बारे में सोचना शुरू हो जाता है। अपने प्रेमी से मिलने पर मन को शांति मिलती है।
सेरोटोनिन के प्रभाव से किसी के प्रति अत्यधिक लगाव पैदा होता है। व्यक्ति पूरी तरह भावनाओं में डूब जाता है और खुद पर नियंत्रण कम हो जाता है। प्यार के अंतिम चरण में यह एहसास होता है कि दोनों एक-दूसरे के साथ लंबे समय तक जीवन बिताना चाहते हैं। इस अवस्था में आपसी संतुष्टि और गहरे जुड़ाव की भावना पैदा होती है।
डॉ. संजीव मिगलानी का कहना है कि प्यार केवल दिल का नहीं, बल्कि दिमाग और शरीर के हार्मोनल संतुलन का भी परिणाम है। वेलेंटाइन सप्ताह में जब प्यार की चर्चा हर तरफ होती है, तब यह समझना जरूरी है कि इसके पीछे साइंस भी उतनी ही मजबूती से काम करता











