सहारनपुर

नजूल भूमि पर कब्जों से कब मिलेगी सहारनपुर को मुक्ति?

नगर आयुक्त और महापौर की भूमिका पर टिकीं निगाहें, रेलवे रोड के बड़े होटल भी सवालों के घेरे में

 

शहरी चौपाल ब्यूरो 

सहारनपुर। तिब्बती मार्केट में नगर निगम की सख्त कार्रवाई के बाद अब शहर भर में नजूल भूमि पर अवैध कब्जों को लेकर बहस तेज हो गई है। नगर की जनता खुलकर सवाल उठा रही है कि जिस तरह नगर आयुक्त और नगर निगम महापौर के निर्देश पर तिब्बती मार्केट को खाली कराया गया, क्या उसी दृढ़ता और निष्पक्षता के साथ शहर की अन्य नजूल भूमि को भी अतिक्रमण मुक्त कराया जाएगा या नहीं।

शहर का प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्र रेलवे रोड वर्षों से नजूल भूमि पर बने बड़े-बड़े होटल, दुकानें और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां ऐसे कई कब्जे हैं, जिनमें प्रभावशाली व्यापारी, भाजपा से जुड़े लोग और बड़े व्यापारी संगठनों से जुड़े नाम सामने आते रहे हैं। ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या नगर आयुक्त और महापौर इन रसूखदार कब्जाधारकों पर भी बुलडोजर चलाने का साहस दिखा पाएंगे।

जनता के बीच यह चर्चा भी आम है कि तिब्बती मार्केट में जिस समुदाय का कब्जा था, उसे भाजपा अपना परंपरागत वोटर नहीं मानती। इसी कारण कुछ लोग इस कार्रवाई को वोट की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि अतिक्रमण हटाने की नीति निष्पक्ष और कानूनसम्मत है, तो फिर रेलवे रोड, और अन्य मुख्य इलाकों में नजूल भूमि पर बने आलीशान निर्माणों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

शहरवासियों का मानना है कि नगर आयुक्त और महापौर के पास नजूल भूमि से संबंधित पूरा रिकॉर्ड और अधिकार है। कई बार सर्वे भी हुए, सूची भी तैयार हुई, लेकिन प्रभावशाली नाम सामने आते ही कार्रवाई ठंडी पड़ जाती है। कमजोर दुकानदारों और छोटे व्यापारियों पर तुरंत कार्रवाई हो जाती है, जबकि बड़े होटल और कॉम्प्लेक्स वर्षों से उसी तरह खड़े हैं।

नगर की जनता अब नगर आयुक्त और नगर निगम महापौर से साफ मांग कर रही है कि नजूल भूमि पर बने सभी अवैध कब्जों की सूची सार्वजनिक की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि कब और किन-किन स्थानों पर कार्रवाई की जाएगी। लोगों का कहना है कि यदि तिब्बती मार्केट की तरह रेलवे रोड और अन्य प्रमुख इलाकों में भी कार्रवाई होती है, तो इससे नगर निगम की निष्पक्षता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति साबित होगी।

सहारनपुर की जनता की नजर अब नगर आयुक्त और महापौर पर टिकी है। सवाल साफ है—क्या नगर निगम अतिक्रमण हटाने में जाति, समुदाय, राजनीतिक पहचान और रसूख से ऊपर उठकर समान कानून लागू करेगा, या फिर तिब्बती मार्केट की कार्रवाई को लोग केवल प्रतीकात्मक कदम और वोट की राजनीति का हिस्सा मानते रहेंगे।

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